गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

हरा–भरा गँउवा रहै मोर (लोकगीत)

तुलसी का चौरा रहै सबके अँगनवा, द्वारे–द्वारे निमिया का ठौर ।
फूली अमरैय्या पाछे ढला करै सूरज, महुआ चुवै त होय भोर–
हरा–भरा गँउवा रहै मोर ।

गोरी जइसे गोर रंग लिहे धरती माई
आवा धानी चुनरी से ओनका सजाई
जुग–जुग बनी रहैं नइकी बहुरिया, बिरवन का अँचरा इ ओढ़–
हरा–भरा गँउवा रहै मोर ।

रोज सँझबाती होय पिपरा की छैंयाँ
कदम्ब के तरे खेलैं राधा औ कन्हैया
बँसुरी का तान टेरै ऊँची बँसवरिया, पुरवा चलै जौ झकझोर–
हरा–भरा गँउवा रहै मोर ।

वट के विरिछ तरे रोज होय चरचा
निमिया का पेड़ बा वैद्य बिन खरचा
तुलसा क गुन सारा जग जानै भैया, पिपरा मा जिनगी कै ठौर–
हरा–भरा गँउवा रहै मोर ।

सब केहू मिलके इ नेम अपनावा
रोपि–रोपि पेड़ स्वर्ग धरती पे लावा
हरियर घुँघटा से झाँकै अँजोरिया,हरी बगियन पे खिलै भोर–
हरा–भरा गँउवा रहै मोर ।

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